अनूप भार्गव जी ने एक बहुत बेहतरीन चिट्ठा शुरु किया है, मेरी पसंद. आज उन्होंने बशीर बद्र साहब के कुछ चुनिंदा शेर पेश किये हैं. पहले उन्होंने निदा फ़ाज़ली साहब के दोहे पेश किये थे. एक दोहा था:
मुझे बड़ा पसंद है यह दोहा, फिर आज उन्हीं के समनाम धन्य अनूप शुक्ल 'फुरसतिया' जी हिजड़ो के द्वारा टेक्स वसूली के पटना नगर निगम की पहल पर अपने विचार ले कर आये. बहुत विचारोत्तेजक और बड़े सार्थक प्रश्न उठाता यह लेख, कुछ लम्बा होने के बावजूद भी, एक ही सांस मे पढ़वाने की काबिलियत रखता है:
एक बार जब बैकों में हिजड़े सफल हो गये तो सारे व्यापारी अपने सारे तकादीगीरों को गले लगाकर विदा कर देंगे और हिजड़े किराये पर पाल लेंगे। हिजड़े उसी तरह तकादगीरों के पेट पर लात मारते नजर आयेंगे जैसे आजकल एक कंप्यूटर चार क्लर्कों को विदा कर देता है। हर बड़ी फर्म अपने यहां हिजड़े रखने लगेगी। किसी भी कंपनी की आर्थिक स्थिति आंकने के लिये देखा जायेगा कि उसने वसूली के लिये कितने हिजड़े रखे हैं।
और आगे कहते हैं:
मांग और आपूर्ति के शाश्वत नियम के चलते कुछ दिनों में हिजड़ों की संख्या में कमी आ जायेगी। हिजड़ों की आकर्षक आर्थिक स्थिति देखते हुये तमाम गुंडे-बदमाश चाकू, तमंचे की नोक या फिर कुछ लेकर-देकर डाक्टरों से अपने हिजड़ा होने का प्रमाण पत्र हासिल करके अपनी गुंडागर्दी की गद्दी चेलों को थमाकर हिजड़ागिरी करने लगेंगे। कोई नामीगिरामी कुख्यात गुंडा,माफिया अपने बुढा़पे में हो सकता है कहे- यार अब अपन से यह सब गुंडागर्दी नहीं हो पाती, हाथ-पैर कांपते हैं किसी तरह से हिजड़ा बनवा दो तो बुढ़ापा चैन से कटे। अभी तक जो कमाया वो सब जमानत और थाने में गंवा दिया अब कम से कम बुढा़पे में तो रोटी के ऊपर रोटी खाने को मिले।
इस सार्थक लेख को जरुर पढ़े और बतायें कि आप क्या सोचते हैं.
इसे पढ़ा, तब, निदा फ़ाजली साहब का दोहा फिर से याद आया और याद आया, मंदिर-मस्जिद का विवाद; फिर निकली दिल की गहराइयों से यह मुण्ड़ली:
//१//
बच्चा बोला देख कर,मस्जिद आलीशान अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान. // निदा फ़ाजली साहब// इतना बड़ा मकान, टेक्स भी ज्यादा होगा न भर पाये जो टेक्स, तो हिजड़ा आता होगा कहत समीर, तुम आधा मंदिर को दे डालो नेता भी मुँह ताकें, हिजड़ों को घास न डालो.
//२//
हिजड़ों की बारात है, जो सब चुन करके आए फिर ये ऐसा क्या हुआ कि बाहर से उन्हें बुलाए बाहर से उन्हें बुलाए कि सब के सब दामाद तुम्हारे कुछ खुद का नहीं ठिकाना, तुम्हरे का काज संवारे? अभी संभल जा, अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है वरना ये बैठेंगे गद्दी पर और कहें कि तू हिजड़ा है.
--समीर लाल 'समीर'
खैर, आगे चलते हैं तो जहाँ रचना जीबचपन की बगिया में टहल टहल कर गीत गा रहीं हैं:
गुम सारे प्यारे मित्र हुए, पशु-पक्षी मानो चित्र हुए, मानव मानो कि यंत्र हुए, रिश्तों के जर्जर तंत्र हुए, किसको फुर्सत? सब व्यस्त हुए, सब अपने मे ही मस्त हुए, बिल्कुल बदला है अब जीवन! कितना—–
फिर, हमारे रा.च. मिश्र जी को गांव की याद आई, तो कुछ राज की बात भी बता गये कि क्या भेद है, दोगला और दुगला में, देखें और आप भी जानें. अगर आप ग्रमीण पृष्ठभूमि से जुड़े है तो तस्वीर निश्चित एक बार आपको अपने गांव की याद दिला जायेगी.
उधर जवान क्षितिज जीबम्बई में जर्मन साथियों की भीड़ में गाईड नजर आ रहे हैं. अमां यार, थोड़ा टोपी, चश्मा लगाओ और हाथ मे बिस्लरी की बाटल लेकर थोड़ा फारेन वाला लुक लाओ, तब तो रुतबा पड़ेगा, वरना तो आपके बर्लिन विश्वविद्यालय के कार्ड को भी नकली बता कर वसूली कर लेंगे.
अब इसी पोस्ट पर अनुराग भाई ने अपने विचार पोस्टनुमा टिप्पणी के द्वारा व्यक्त कर मारे. जितनी लम्बी क्षितिज की पोस्ट नहीं है, उससे भी कहीं ज्यादा लम्बी यह टिप्पणी है, जो कि अगर पोस्ट के माध्यम से आती तो जरुर विवादित श्रृंखलाओं की माला की सबसे मोटी मोती का मुकाबला करते नजर आती मगर अच्छा है, टिप्पणियों के बीच दबकर रह गई है. इसे यहाँ बता कर मै आम नेताओं की तरह विवाद भड़काने में नहीं लगा हूँ, मगर फर्ज पूरा कर रहा हूँ ताकि कोई विवाद पीर(पहलवान) कहीं हमें ही न धर ले, कि इतना बढ़ियां मसाला
अनूप भार्गव जी ने एक बहुत बेहतरीन चिट्ठा शुरु किया है, मेरी पसंद . आज उन्होंने बशीर बद्र साहब के कुछ चुनिंदा शेर पेश किये हैं. पहले उन्होंने निदा फ़ाज़ली साहब के दोहे पेश किये थे. एक दोहा था:
मुझे बड़ा पसंद है यह दोहा, फिर आज उन्हीं के समनाम धन्य अनूप शुक्ल 'फुरसतिया' जी हिजड़ो के द्वारा टेक्स वसूली के पटना नगर निगम की पहल पर अपने विचार ले कर आये. बहुत विचारोत्तेजक और बड़े सार्थक प्रश्न उठाता यह लेख, कुछ लम्बा होने के बावजूद भी, एक ही सांस मे पढ़वाने की काबिलियत रखता है:
एक बार जब बैकों में हिजड़े सफल हो गये तो सारे व्यापारी अपने सारे तकादीगीरों को गले लगाकर विदा कर देंगे और हिजड़े किराये पर पाल लेंगे। हिजड़े उसी तरह तकादगीरों के पेट पर लात मारते नजर आयेंगे जैसे आजकल एक कंप्यूटर चार क्लर्कों को विदा कर देता है। हर बड़ी फर्म अपने यहां हिजड़े रखने लगेगी। किसी भी कंपनी की आर्थिक स्थिति आंकने के लिये देखा जायेगा कि उसने वसूली के लिये कितने हिजड़े रखे हैं।
और आगे कहते हैं:
मांग और आपूर्ति के शाश्वत नियम के चलते कुछ दिनों में हिजड़ों की संख्या में कमी आ जायेगी। हिजड़ों की आकर्षक आर्थिक स्थिति देखते हुये तमाम गुंडे-बदमाश चाकू, तमंचे की नोक या फिर कुछ लेकर-देकर डाक्टरों से अपने हिजड़ा होने का प्रमाण पत्र हासिल करके अपनी गुंडागर्दी की गद्दी चेलों को थमाकर हिजड़ागिरी करने लगेंगे। कोई नामीगिरामी कुख्यात गुंडा,माफिया अपने बुढा़पे में हो सकता है कहे- यार अब अपन से यह सब गुंडागर्दी नहीं हो पाती, हाथ-पैर कांपते हैं किसी तरह से हिजड़ा बनवा दो तो बुढ़ापा चैन से कटे। अभी तक जो कमाया वो सब जमानत और थाने में गंवा दिया अब कम से कम बुढा़पे में तो रोटी के ऊपर रोटी खाने को मिले।
इस सार्थक लेख को जरुर पढ़े और बतायें कि आप क्या सोचते हैं.
इसे पढ़ा, तब, निदा फ़ाजली साहब का दोहा फिर से याद आया और याद आया, मंदिर-मस्जिद का विवाद; फिर निकली दिल की गहराइयों से यह मुण्ड़ली :
//१//
बच्चा बोला देख कर,मस्जिद आलीशान अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान. // निदा फ़ाजली साहब// इतना बड़ा मकान, टेक्स भी ज्यादा होगा न भर पाये जो टेक्स, तो हिजड़ा आता होगा कहत समीर, तुम आधा मंदिर को दे डालो नेता भी मुँह ताकें, हिजड़ों को घास न डालो.
//२//
हिजड़ों की बारात है, जो सब चुन करके आए फिर ये ऐसा क्या हुआ कि बाहर से उन्हें बुलाए बाहर से उन्हें बुलाए कि सब के सब दामाद तुम्हारे कुछ खुद का नहीं ठिकाना, तुम्हरे का काज संवारे? अभी संभल जा, अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है वरना ये बैठेंगे गद्दी पर और कहें कि तू हिजड़ा है.
--समीर लाल 'समीर'
खैर, आगे चलते हैं तो जहाँ रचना जी बचपन की बगिया में टहल टहल कर गीत गा रहीं हैं:
गुम सारे प्यारे मित्र हुए, पशु-पक्षी मानो चित्र हुए, मानव मानो कि यंत्र हुए, रिश्तों के जर्जर तंत्र हुए, किसको फुर्सत? सब व्यस्त हुए, सब अपने मे ही मस्त हुए, बिल्कुल बदला है अब जीवन! कितना—–
फिर, हमारे रा.च. मिश्र जी को गांव की याद आई, तो कुछ राज की बात भी बता गये कि क्या भेद है, दोगला और दुगला में, देखें और आप भी जानें. अगर आप ग्रमीण पृष्ठभूमि से जुड़े है तो तस्वीर निश्चित एक बार आपको अपने गांव की याद दिला जायेगी.
उधर जवान क्षितिज जी बम्बई में जर्मन साथियों की भीड़ में गाईड नजर आ रहे हैं. अमां यार, थोड़ा टोपी, चश्मा लगाओ और हाथ मे बिस्लरी की बाटल लेकर थोड़ा फारेन वाला लुक लाओ, तब तो रुतबा पड़ेगा, वरना तो आपके बर्लिन विश्वविद्यालय के कार्ड को भी नकली बता कर वसूली कर लेंगे.
अब इसी पोस्ट पर अनुराग भाई ने अपने विचार पोस्टनुमा टिप्पणी के द्वारा व्यक्त कर मारे. जितनी लम्बी क्षितिज की पोस्ट नहीं है, उससे भी कहीं ज्यादा लम्बी यह टिप्पणी है, जो कि अगर पोस्ट के माध्यम से आती तो जरुर विवादित श्रृंखलाओं की माला की सबसे मोटी मोती का मुकाबला करते नजर आती मगर अच्छा है, टिप्पणियों के बीच दबकर रह गई है. इसे यहाँ बता कर मै आम नेताओं की तरह विवाद भड़काने में नहीं लगा हूँ, मगर फर्ज पूरा कर रहा हूँ